बेमौसम सब्जियां घटा रहीं शरीर में हीमोग्लोबिन

कानपुर वरिष्ठ संवाददातायह ठीक है कि हरी सब्जियों का खूब इस्तेमाल करें। यह रोगों को दूर रखने और बीमारियों के इलाज में अहम साबित हो रही है लेकिन अगर आपको बेमौसम बाजार में सोया, मेथी, पालक, गोभी, हरी प्याज, मटर आदि हरी सब्जियां देखकर लालच आ रहा है। आप उसे नियमित इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह भी संभव है कि आप अच्छे के चक्कर में गम्भीर बीमारी खरीद रहे हैं। शोध में यह बात सामने आई है कि बेमौसम सब्जियों में पेस्टीसाइड की मात्र अधिक मिल रही है, जो शरीर में खून की कमी कर रही हैं। पेट की गम्भीर बीमारी दे रही हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के संयोजन में कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स (सीजीपी) की कार्यशाला में डॉक्टरों को यह जानकारी केजीएमयू के हीमेटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एके त्रिपाठी ने दी। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्र की महिलाओं और पुरुषों दोनों में हीमोग्लोबिन की कमी मिल रही है। 70 फीसदी महिलाओं में खून की कमी मिल रही है। शहरी पुरुषों में वह लोग जो पान मसाला खाते हैं या तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे 90 फीसदी लोगों में खून बनने की क्षमता कम होती है। सामान्य पुरुषों में भी 40 फीसदी बार्डर लाइन पर होते हैं। प्रो. त्रिपाठी के मुताबिक हरी सब्जी खाना चाहिए लेकिन सोच लें कि उस सब्जी का मौसम है या नहीं? बच्चों में पेस्टीसाइड की मात्र कैंसर तक दे देती है। एप्लास्टिक एनीमिया की बड़ी वजह पेस्टीसाइड है।

विटामिन डी के लिए इंजेक्शन काफी खतरनाक साबित हो रहे हैं। विटामिन डी की जरूरत एक पाउच पाउडर में पूरी हो जाती है। इसमें 60000 यूनिट विटामिन डी होता है लेकिन यही एक इंजेक्शन में छह लाख यूनिट हो जाता है।

कानपुर। आप चाहे जितना कैल्शियम की गोली खां लें। मगर, हड्डी में वह तभी लगेगी जब विटामिन डी खून में मौजूद हो। यह विटामिन डी भारतीय लोगों में भारी मात्र में कम है। 80 फीसदी लोगों को विटामिन डी नहीं मिल पा रहा है इसलिए आप जो भी कैल्शियम लेते हैं वह शरीर में नहीं लगता है। शरीर में कैल्शियम को हड्डियों पर कारगर करने के लिए विटामिन डी के सिवा कोई उपाय नहीं है। आईएमए सीजीपी में पदमश्री डॉ. अम्बरीश मित्तल ने विटामिन डी पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि चूंकि डाइट में यह विटामिन नहीं मिलती है। डॉ. मित्तल के मुताबिक विटामिन डी मिलावट से दूध या सोयाबीन का कास्ट नहीं बढ़ता है। भारतीय की त्वचा ऐसी है कि विटामिन डी का अवशोषण कम होता है। अगर आम भारतीय धूप में 25-30 मिनट रहते हैं तो उन्हें एक महीने में 4 नैनोग्राम विटामिन डी मिल पाती है। 20 नैनोग्राम होना चाहिए। यही मात्र उन देशों में जो कर्क रेखा से दूरी पर हैं उन्हे 5 मिनट में ही 30 नैनोग्राम मात्र मिल जाती है। कहा बीएमडी जांच अल्ट्रासाउंड तकनीक से कभी नहीं कराएं। चेयरपर्सन डॉ. संजय रस्तोगी व डॉ. बृज मोहन थे। प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. नंदिनी रस्तोगी थीं।

आठ दिनों तक चलने वाले सीजीपी कार्यशाला में पहले दिन पीजीआई के निदेशक प्रो. राकेश कपूर मुख्य अतिथ थे। विशिष्ठ अतिथि प्राचार्य प्रो. नवनीत कुमार रहे। उन्होंने आए मेहमानों को शाल उढ़ाकर सम्मानित किया। आईएमए अध्यक्ष प्रो. किरण पाण्डेय ने सीजीपी कार्यक्रम की रूपरेखा बताई। रेफ्रेशर कोर्स के असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. आरपीएस भदौरिया ने कोर्स की अहमियत को रेखांकित किया। सचिव प्रो. आरसी गुप्ता ने संगठन की उपलब्धियां बताईं। स्मारिका का विमोचन किया गया। संचालन डॉ. राज तिलक व डॉ. शालिनी मोहन ने किया। वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ.प्रवीन कटियार, डॉ. गौरव नाथ भल्ला,डॉ. अर्चना भदौरिया,डॉ. बृजेन्द्र शुक्ला, डॉ.मनीष निगम, डॉ.विकास मिश्र आदि मौजूद थे।

प्रो. ए के त्रिपाठी ने कहा कि प्लेटलेट्स अगर 30 हजार के नीचे भी पहुंच गया है तो दवा देने की जरूरत नहीं। जिस बीमारी का इलाज हो रहा है उसी से प्लेटलेट्स पूरा हो जाता है। अब तो मानक बदल गए हैं। अगर प्लेटलेट्स की संख्या एक लाख तक है तो वह सामान्य है इससे पहले डेढ़ लाख से 4.5 लाख तक इसका मानक था। तीमारदारों को डॉक्टरों पर भरोसा करना चाहिए । प्लेटलेटस को लेकर डॉक्टरों पर चढ़ाने का दबाव नहीं बनाएं। उन्होंने कहा कि प्लेटलेट्स की संख्या या जांच खून लेने, उसे स्टोर करने पर भी निर्भर करती है। 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर उसे ब्लड सैम्पल रखने की जरूरत है। अगर खून निकालने के आधे घंटे के भीतर जांच होगी तो बेहतर रिजल्ट मिलता है। मशीन से जांच के बाद मैनुअली जांच भी जरूरी है। मशीनों से जांच में कुछ प्रतिशत त्रुटि की संभावना रहती है।

जल्द की बाजार में ऐसा इंसुलिन इंजेक्शन आने वाला है जिसे लगाने के बाद मरीजों को एक सप्ताह की छुट्टी मिल जाएगी। इंजेक्शन की खासियत होगी कि यह वजन भी घटाएगा। अभी तक जो इंजेक्शन चल रहे हैं वह वजन बढ़ाते हैं।

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