मिजोरम में विश्वास और ईमानदारी के भरोसे चलता है एक ऐसा बाज़ार, जहां न है CCTV और न कोई दुकानदार

टेक्नोलॉजी के इस ज़माने में हर व्यक्ति अपने सामान को सुरक्षित रखना चाहता है. लोगों का बस चले तो वो चोरी के डर से अपने जूते और चप्पल भी ताला लगा कर रखें. लेकिन इसमें दोष लोगों का भी नहीं है, ज़माना ही इतना ख़राब हो गया है कि पलक झपकते ही चीज़ गायब हो जाती है. आपने ही गौर किया होगा कि आजकल हर दुकान में सीसीटीवी कैमरे लगे होते है, ताकि वहां पर चोरी न हो, लेकिन चोर तो चोर है कहीं भी चोरी कर सकते हैं. फिर चाहे सीसीटीवी कैमरा लगा हो या न लगा हो. लेकिन इसका ये मलतब बिलकुल नहीं है कि दुनिया में ईमानदारी ख़त्म हो चुकी है. बल्कि आज भी दुनिया में ईमानदारों की कमी नहीं है.

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अब अपने देश को ही ले लीजिये यहां पर एक ऐसी जगह है, जहां दुकानों में न ही सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और न ही कोई दुकानदार ही बैठता है. जी हां ये बिलकुल सच है. यह जगह है मिजोरम में स्थित एक मार्केट जहां पर न तो सीसीटीवी कैमरा है और न ही दुकानदार है. इस मार्केट में आपको मिलेगा बस खरीदने के लिए सामान और उसकी कीमत रखने के लिए एक बॉक्स। फिर भी देखिये लोगों की ईमानदारी कि यहां पर कोई भी चोरी नहीं करता है.

तो चलिए अब आपको रूबरू करवाते हैं बिना सीसीटीवी और दुकानदार वाले इस मार्केट से:

मिजोरम एक ऐसा राज्य हैं, जहां के कण-कण में सुंदरता बसी हुई है. शायद इसीलिए ये अपनी प्राकृतिक ख़ूबसूरती मशहूर है. ये राज्य जितना खूबसूरत और आकर्षक है, उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत दिल के मालिक हैं यहां के लोग. गौरतलब है कि यहां के लोग विनम्र होने के साथ-साथ ईमानदार और सच्चे होते हैं. वैसे तो इस बात के कई उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, उन्हीं में से एक उदाहरण है मिजोरम में पायी जाने वाली दुकानें, जो ‘नघा लोउ दावर’ के नाम से जानी जाती हैं. राजधानी, ऐजवल से 65 किमी की दूरी पर हाईवे पर स्थित ये दुकानें, सिर्फ और सिर्फ विश्वास पर चल रहीं हैं. और यही इनकी सबसे बड़ी खासियत है.

यह दुकानें ज़्यादातर छोटे किसानों द्वारा लगायी जाती हैं, जो हर सुबह बांस से बंधे हुए ताख पर फल सब्जियां आदि रख देते हैं और उसके बगल में चॉक या कोयले से उनके दाम लिख कर झूम खेती (जगह जगह किये गए छोटी छोटी खेती) के लिए निकल जाते हैं. इसी बीच वहां से गुजरने वाले लोग अपनी ज़रूरत के हिसाब से इन दुकानों पर सही दाम रख कर, सामान ले जाते हैं.

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फल, सब्जियों, फलों के रस, छोटी मछलियों, आदि की टोकरियों से सजी इन दुकानों पर कोई भी दुकानदार नहीं बैठता और सीसीटीवी की तो बात ही सोचना बेकार है. तरीके से सजे खाने-पीने के इन सामानों के पास ही रखे एक तख़्ते पर इनका मूल्य लिखा होता है. इन्हें खरीदने वाले ग्राहक अपनी ज़रूरत का सामान उठा कर यहां रखे कटोरे या बॉक्स, जिन्हें ‘पविसा बावन’ या ‘पविसा दहना’ कहा जाता है, में सामान का मूल्य डाल देते हैं. यहीं पर, दुकानदार द्वारा छुट्टे या खुले पैसों का भी एक डब्बा रखा होता है, जिसमें से ग्राहक बाकि पैसे खुद ही उठा सकते हैं.

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इन दुकानों को चलाने वाले किसान अधिकतर गरीब तबके के होते हैं, जिन्हें अपना घर चलाने के लिए पुरे साल झूम खेती भी करनी पड़ती है. ऐसे में न तो वो खुद इन दुकानों पर बैठ सकते हैं और न ही किसी को वहां बैठने के लिए रख सकते हैं. क्योंकि जो भी दूकान पर बैठेगा किसान को उसको पैसे देने पड़ेंगे, जिसमें वो असमर्थ होते हैं. इसी कठिनाई का सरल उपाय बना है ‘नघा लोउ दावर’.

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इसे चलाने वाले दुकानदार अभी तक इससे खुश हैं और मानते हैं कि उनके ग्राहकों ने आज तक उन्हें निराश नहीं किया.

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आज के आधुनिक युग में, मिजोरम में स्थित ये दुकानें ईमानदारी की मिसाल खड़ी कर रहीं हैं और दूसरों के लिए एक प्रेरणास्रोत भी हैं. इन किसानों और उनके ग्राहकों से हमें यह सीख लेनी चाहिए विश्वास और ईमानदारी के बिना हम एक बेहतर और विकसित समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. अगर हमें आगे बढ़ना है तो म विश्वास और सच्चाई को कायम रखना होगा.

Source: thebetterindia

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