कानपुर में ओईएफ सहित पांच फैक्ट्रियां बंद करने की साजिश

ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों को जबरन बीमारू घोषित करने के लिए छल-प्रपंच किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में सेना के लिए टेक्सटाइल उत्पाद बनाने वाली पांच आयुध निर्माणियों को बंद करने की साजिश रची जा रही है। इनमें से चार फैक्ट्रियां यूपी की हैं। उनमें भी दो ओईएफ और ओपीएफ कानपुर की हैं। यह दावा ऑल इंडिया डिफेंस इम्पलाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एसएन पाठक ने किया।

fieldgun-03-02-2017-1486108829_storyimageगुरुवार को फील्डगन फैक्ट्री में सभा के बाद विशेष बातचीत में उन्होंने सरकारी नीतियों पर खुलकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से दो महीने पहले एक फाइल चली थी, जिसमें सेना के लिए कपड़े के उत्पाद बनाने वाली आयुध निर्माणियों को बंद करने का प्रस्ताव दिया गया था। इस प्रस्ताव को रक्षा सचिव ने स्वीकार कर लिया और रक्षामंत्री को फाइल आगे बढ़ा दी। इस फाइल में सेना के लिए कपड़े के उत्पाद निजी क्षेत्र से खरीदने का सुझाव दिया गया है। उन्होंने कहा कि इन चार इकाइयों में करीब 15 हजार कर्मचारी काम करते हैं। ये इकाइयां ओईएफ कानपुर, ओपीएफ कानपुर, शाहजहांपुर और हजरतपुर में हैं। उनके साथ सेंट्रल एग्जीक्यूटिव मेम्बर शेखर चंद्र राय, सतीश यादव, छविलाल यादव, सौरभ सिंह और भूपेन्द्र यादव थे।

आजतक टारगेट फेल नहीं,फिर किस बात की सजा

राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि हमारे उत्पादों का खरीदार डिफेंस है। हमें आर्डर दीजिए, हम माल बनाएंगे। आर्डर देना सरकार का काम है। हमें काम ने देकर बीमारू घोषित करने की तैयारी की जा रही है। जबकि आर्डिनेंस फैक्ट्रियों का उत्पादन 12 हजार करोड़ से बढ़कर 17 हजार करोड़ रुपए हो गया है। आजतक कोई टारगेट किसी इकाई में फेल नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि पहले भी निजीकरण के तहत एक कंपनी को 1.27 लाख पीस का आर्डर दिया गया था। घटिया क्वालिटी की वजह से सेना ने उसे वापस कर दिया था। रक्षा के नाम पर सुरक्षा के साथ खिलवाड़ पर उन्होंने कहा कि इसका खामियाजा देश भुगतेगा।

हथियार डेवलप कर दिए, काम तो दीजिए

एसएन पाठक ने कहा कि ओएफसी इटारसी पिनाका के आर्डर के इंतजार में एक साल से बैठी है। हाल ये है कि सरकार कच्चा माल खरीदने का बजट फरवरी में पास करती है। जून में पैसा आता है और सितम्बर में कच्चा माल मिलता है। फिर हमसे कहा जाता है कि फरवरी में उत्पाद तैयार करके दो। ऐसे में थोड़ा विलम्ब हो जाए तो फैक्ट्रियों के कामकाज पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

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