इन हैरतअंगेज अंदाज में सम्पन्न हुआ जिले का चुनाव

phpthumb_generated_thumbnailकानपुर देहात. मतदान को लेकर पोलिंग पार्टियां एक दिन पूर्व ही बूथों पर पहुंच गयी थी। जिले के रसूलाबाद विधानसभा के मेघजाल प्राइमरी विद्यालय की पोलिंग पार्टी लेकर बस शनिवार देर रात मेघजाल जिनई छोड़ने जा रही थी। जैसे ही बस मुहमदपुर गांव के समीप पहुंची तो वहां से गुजरी हाईटेंशन लाइन का तार अचानक बस की छत से छू गया। करेंट दौड़ने पर चिंगारी निकलते देख बस में बैठे पोलिंग पार्टी के पीठासीन अधिकारी सुरेश कुमार सहायक शंकरलाल व आरक्षी लालमणि यादव तीनों लोग चलती बस से नीचे कूद गये। जिससे तीनों घायल हो गये। जिन्हे एम्बुलेंस द्वारा सीएचसी रसूलाबाद भेजा गया। डॉक्टर जेपी सिंह ने प्राथमिकि उपचार कर जिला अस्पताल रेफर कर दिया।
वहीं रिजर्व पोलिंग पार्टी मेघजाल भेजकर मतदान सम्पन्न कराया गया। सलेमपुर पोलिंग पर खाना बनाते समय किचेन में लगी आग पोलिंग पार्टी के लिये डेरापुर के सलेमपुर गांव में बने बूथ पर विधालय की रसोइयां सुधा सोनकली शांति विनीता खाना बना रही थी। दाल चावल बनाने के बाद वे रोटी सेंक रही थी। तभी गैस सिलेंडर का पाईप लीकेज हो गया। जिससे किचेन में आग लग गयी रसोइया के शोर मचाने पर पोलिंग पर लगे एजेंट सुरेश बाबू ने पहुंचकर आग बुझाने का प्रयास किया। लेकिन आग बढ़ने लगी तभी उन्होंने मतदान स्थल पर पड़ी बालू से आग पर काबू पाया। हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ। मौके पर पहुंचे थानाध्यक्ष फाजिल सिद्दीकी ने बताया कोई हताहत नहीं हुआ है।12
सुनवर्षा गांव में वोट डालने जा रही वृद्धा की रास्ते में मौत
रसूलाबाद विधानसभा क्षेत्र के गांव सुनवर्षा की 65 वर्षीय मतदाता तुलसी देवी बीमारी से ग्रसित चल रही थी। मतदान की सुबह उन्होंने अपने पुत्र मुन्ना सुनील से वोट डलवाने के लिये कहा लेकिन बीमारी के चलते पुत्रों ने वोट डालने से मना कर दिया। इसके चलते मतदान में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने के उद्देश्य से वह अकेले ही बूथ की तरफ निकल पड़ी। रास्ते में वह गश खाकर गिर पड़ी। जानकारी पर पहुंचे पुत्र उन्हे मैथा अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहे थे लेकिन रास्ते में उनकी मौत हो गयी। बेटे सुनील ने कहा कि मां की मतदान करने की तमन्ना पूरी नहीं हो सकी। मालूम होता तो गोद में ले जाकर वोट डलवा देते।13

यूपी की जंग में गर नहीं मिला किसी को बहुमत,तो ऐसे बनेगी सरकार

-आवेश तिवारी
वाराणसी -उत्तर प्रदेश में तीन चरणों के मतदान हो चुके हैं सियासी हलकों में ही नहीं चौक चौराहों ,दफ्तरों ,खबरनवीसों की बैठकों में हर जगह केवल चुनाव और उम्मीदवारों की चर्चा जेरेगौर है। राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों के जीत को लेकर अपने अपने दावे हैं लेकिन एक बड़ा सवाल अब तक अनुत्तरित है कि अगर किसी भी दल या गठबंधन को को बहुमत नहीं आया तो फिर उत्तर प्रदेश में क्या होगा ?तीन चरणों के बाद प्रदेश में जो सियासी माहौल बना नजर आ रहा है उनमे यह सवाल अनवरत बड़ा होते चला जा रहा है ,अगर यूपी के सियासी समीकरणों और संभावनाओं को गौर से देखे तो कई चौका देने वाली चीजें नजर आती हैं ।
क्या कर सकती है कांग्रेस गर नहीं आया महागठबंधन का बहुमत
चुनाव पूर्व समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच हुए गठबंधन के बाद यह बात लगभग तय हो गई है कि अगर उत्तर प्रदेश में स्पष्ट जनादेश नहीं आता है और किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलता है तो क्या सियासी समीकरण बनेंगे। जो राजनैतिक हालात है उसमे यह लगभग तय है कि समाजवादी पार्टी किसी भी कीमत पर न तो भाजपा से सरकार बनाने में कोई मदद लेगी या देगी। लेकिन एक सवाल यह जरुर है कि क्या भाजपा को सत्ता से दूर रखने और उत्तर प्रदेश को राष्ट्रपति शासन से दूर रखने के लिए सपा कांग्रेस गठबंधन ,बसपा को समर्थन ले या दे सकता है ?जो हालत है उसमे एक बात तय है कि बहुजन समाज पार्टी किसी भी कीमत पर अखिलेश यादव को दोबारा मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहेंगी। अखिलेश यादव भी ऐसा किसी कीमत पर नहीं चाहेंगे ,लेकिन गठबंधन में शामिल कांग्रेस पार्टी मुद्दों और भाजपा को सत्ता से दूर रखने के नाम पर बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देने के बारे में सोच सकती है ।यह भी संभव है कि गैर भाजपा दल कोई साझा मंच बनाने की कोशिश करें लेकिन ऐसे किसी मंच में सपा शामिल होगी कहना मुश्किल हैं।
कहाँ रहेगी भाजपा, किधर जाएगी बसपा
सियासी हलकों में इस बात को लेकर चर्चा जोरों पर हैं कि चुनावों के बाद भाजपा और बसपा का गठजोड़ हो सकता है हाल यह है कि इस बात की भी जोरों से मीमांसा हो रही है कि क्योंकर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी अपनी सभाओं में मायावती का पुरजोर विरोध नहीं कर रहे हैं ? पूर्व में भी यूपी में बसपा और भाजपा के गठबंधन की सरकार रही है यहाँ तक कि दोनों ही दलों में कई बड़े नेता ऐसा हैं जो भाजपा से बसपा में या बसपा से भाजपा में गए हैं। बसपा की ब्राह्मण लाबी को कभी भी भाजपा से हाथ मिलाने में गुरेज नहीं रहा है हांलाकि पार्टी की दलित लाबी ने हमेशा इसकी खिलाफत की है। बसपा महासचिव सतीश चन्द्र मिश्रा और इन्द्रजीत सरोज जैसे नेताओं के भाजपा के बड़े नेताओं से अच्छे सम्बन्ध है लेकिन एक बात जो बेहद चर्चा में है वो यह है कि भाजपा ,बसपा के सहयोग से सरकार बनाने का जोखिम नहीं उठाएंगी हालांकि वो कांग्रेस और सपा को रोकने के लिए बसपा का समर्थन कर सकती है।
निर्दलियों और छोटे दलों की ताकत
इन चुनावों में बड़े पैमाने पर निर्दलियों और छोटे दलों के उम्मीदवारों के चुनाव जीतने का अनुमान लगाया जा रहा है ।2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 9 सीटें निर्दलियों ने जीती थी वही 7 सीटें छोटे दलों के कब्जे में थी। नहीं भुला जाना हिए कि इस बार यूपी चुनाव् में भारी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इन निर्दलियों में बड़ी तादात उनकी है जो समाजवादी पार्टी छोड़कर चुनाव लड़ रहे हैं। एक बड़ा अनुमान यह है कि इस बार निर्दलीय और छोटी पार्टियों के विधायकों की संख्या 40 से भी ऊपर जा सकती है ।अगर ऐसा हुआ तो वो सरकार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे ,लेकिन यह तय है कि इन निर्दलियों को साथ लेंने में भाजपा पहले नंबर पर होगी और बहुजन समाज पार्टी दूसरे नंबर पर होगी।
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