कनपुरिया स्वाद

कनपुरिया चटखारा … आह क्या कहने

ठग्गू के लड्डू

ठग्गू के लड्डू

 

आप हिंदुस्तान की कितनी ही जगहों की मिठाई और चाट खाए  हो लेकिन  जो मजा कानपुर की  मिठाइयो और चाट  को चाटकर खाने में है वह ना तो बंबई में मिल सकती हिया ना दिल्ली में | खाना खजाना का संजीव कपूर जब भी कानपुर आते है तो उनका ठेका ठग्गू के लड्डू पर ही होता है |

 

 

jbबुद्धसेन स्वीट हाउस से संदेश , खोया, मंदी में हाथरस वाले की इमरतिया किसी श्रृगार रस की कविता की ही भांति रसीली है | कानपुर में जलेबी सुबह हर हलवाई बनाता है जैसे मन्दिर में सुबह पुजारे भगवान् का पूजन करता है वैसे दही जलेबी का कलेवा करना यहाँ नाश्ते में  शुमार  है |

 

gआर्यनगर के घोष के रसगुल्लों का कहना ही क्या  मिठाइयो   में कानपुर का टक्कर सिर्फ बनारस ही ले पाता  है भीखाराम महावीर प्रसाद और बिराहना रोड के अर्जुन सिंह  की कचौड़ियाँ १६ दोनों में तरह तरह की सब्जियों चटनियों और रायते के साथ जब सामने होती है … आह क्या कहने

 

 

 

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रात के डेढ़ बजे हैं। हम शहर के उस हिस्से में हैं जहां दिन सा माहौल है। भीड़ इतनी कि, बड़े आराम से तो पैदल भी न निकल पाएं। शमां हर तरफ रोशन है। खुशबू भी फिजां में अपनी बादशाहत कायम किए हुए है। कहीं सेवई बन रही है तो कहीं कुलचे। कहीं चाय की चुस्कियों संग खुदा की इबादत पर चर्चा चल रही है तो कहीं हो रही सहरी की तैयारी। हजारों लोग सड़क पर हैं मगर शोर बिल्कुल नहीं। जूते से लेकर कपड़ों की दुकानें सड़क पर यूं लगीं हैं मानो खास बाजार में आए हैं।दो बजे : बेकनगंज में रूपम टाकीज के सामने हम पहुंचे हैं। कुछ मौलाना कुर्सियों पर विराजमान हैं। बगल में लस्सियां बन रहीं हैं और साथ में बन, वो भी मक्खन के साथ। महज दो रुपए में। पूछा-जनाब इतना सस्ता कहां से लाए? दुकानदार ने कहा-जहां महंगा है वे बेचते हैं। हम तो खुद बनाते हैं। कमाल का न लगे तो बताइए। सहसा हमारी नजर सामने गई तो देखा चूड़ियों का बाजार सजा था। कई महिलाएं वहां खड़ी थीं। एक से एक चूड़ियां। ज्यादातर फिरोजाबादी। सवा दो बजे : हम अजमेरी होटल की ओर मुड़े हैं। चौराहे पर एक सेवई की बड़ी दुकान है। लिखा है बनारसी सेवई। देखने में बड़ी बारीक। पूछ बैठे-क्या वाकई बनारसी है। दुकानदार मो. रिजवान कहते हैं-अब कहां जनाब। हकीकत ये है कि अब बनारस का नाम चलता है। ये सेवई तो हम कानपुर में ही बना लेते हैं। ढाई बजे : हम चमनगंज चौराहे पर खड़े हैं। यहां जूते बड़े सस्ते हैं। डेढ़ सौ रुपए में स्पोर्ट्स शू मिल रहे हैं। ढेर सारे युवक और परिवार यहां हैं। कोई बच्चे के लिए खरीद रहा है तो कोई पिता के लिए। महिलाएं अपने लिए जूती ले रही हैं। बगल में कपड़े की दुकानों पर कुर्ते पाजामा की भरमार। चकाचक सफेद। हुमायूं बाग निवासी हैदर बेग और चमनगंज के शादाब भी खरीद रहे हैं। बगल में स्टेट बैंक के कैशियर खालिद भाई भी हैं। कहते हैं-ये बाजार प्यार का है, महंगा माल भी सस्ते में।

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कानपुर। रमजान पर शहर के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में रात का नजारा देखते ही बनता है। गुलजार बाजार रात को जवां बनाए रखते हैं। यहां की खानपान की दुकानों पर लगने वाली भीड़ दिन की दुकानदारी को भी मात देती दिखती है। जगह-जगह छोटी महफिलों में अदब और जुबां का मिश्रण दिल जीत लेता है।

 

यह है जुम्मन नूरी नहारी कोल्चे वाले जो की हर साल रमजान में अपनी दुकान अजमेरी होटल चौराहे चमन गंज के पास लगाते हैं और कानपुर के कोने कोने से लोग इनकी नहारी कोल्चे का स्वाद चखने यहाँ आते हैं,क्या आपने खाई है जुम्मन मियां की कोल्चे नहारी ?

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